अब तो जागो मानवों !
शीर्षक देख के आप शायद अपमानित महसूस कर रहे होंगे, लेकिन मेरी इच्छा आप को अपमानित करने की नहीं है, सिर्फ आपको आने वाले कष्टकारी समय से रूबरू कराने की है, ताकि वक्त रहते आने वाले त्रासदी को महसूस कर उचित उपाय कर सकें।
आज से लगभग 15-20 साल पहले की बातों को याद करते हैं और खुद से सवाल करते हैं, क्या ऋतुएँ ऐसी थीं जैसे आज है? आपका उत्तर ना में होगा। उस समय एक छोटा टेबल पंखा हो तो भी ग्रीष्म ऋतु की रात आसानी से कट जाती थी।आज बिना कूलर AC के नींद नहीं आती है।एक समय था जैसे जून 15 आया मतलब मानसून आ गया, अब जुलाई भी आ जाए तो भी ये कह नहीं सकते मानसून आएगा या नहीं।मुझे अच्छी तरह याद है जैसे बारिश का मौसम आता था, तुरंत अलमीरा और दीवान से कम्बल बाहर आते थे, क्योंकि ठंड बढ़ जाती थी और आज के समय में अकटूबर महीने तक AC और कूलर चलते रहता है।आने वाले 10-15 साल में क्या होने वाला है आप और हम सोच भी नहीं सकते।

हम टेक्नॉलोजी की बात करें तो दुनिया चाँद व मंगल तक पहुँच गयी है।आप बैंकिंग, शॉपिंग, खाने का ऑर्डर आप सब कुछ कर सकते है, सिर्फ एक 5 इंच के मोबाईल से, वो भी बेड पर लेटे लेटे, जो कल तक असंभव था वो आज की टेक्नॉलजी ने कर दिखाया है।टेक्नॉलजी दुनिया को तो बेहतर से बेहतर बनाती जा रही है, इस बात पर कोई दोराय नहीं है,लेकिन जो जीने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है,बस लोग पानी बचाओ,जंगल बचाओ, मिट्टी बचाओ,प्लास्टिक इस्तेमाल मत करो, वायु प्रदूषित मत करो आदि के बारे में लोग नारेबाज़ी करते रहते हैं।ये सब ढाकोसला केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट कर झूठी वाह-वाही बटोरने में लगे हुए हैं।

अर्थ-डे पर एक-दो छोटे पेड़ लगा के एक अच्छा सा सेल्फ़ी लेके ऐसे दिखाते है, मानो अब सारी समस्याओं का समाधान इन्होंने कर दिया है।इसके साथ ही शासन-प्रशासन भी इस काम के लिए करोड़ों का फ़ंड जारी करती है और पेड़ लगाने का दिखावा करते हैं,लेकिन वास्तविकता में 5 या 10% का काम हो पाता है। क्या हम ख़ुद को धोखा नहीं दे रहे हैं? आने वाली पीढ़ी का क्या हाल होने वाला है,आप और हम आज अंदाज़ा भी नही लगा सकते हैं। हम अपने दिल पे हाथ रख के एक बार सोचें क्या हम सही कर रहे हैं? क्या ये हर एक मानव की ज़िम्मेदारी नहीं है? कुछ संस्था मेहनत कर रही है।कुछ देश इस समस्या को हल करने की कोशिश में लगे हुए हैं। हमारे देश में कुछ समझदार लोग हैं, जो इस काम को बहुत ज़िम्मेदारी से निभा रहे है।गर्व होता है कुछ लोग मेरे देश में भी हैं, जो आने वाले कल के संकट को देख पाते है और उस भविष्य में होने वाले दर्द को अभी से महसूस कर पा रहे हैं।

वृक्षा रोपण की बात तो ज़माने से हो रही है,जिसमें बस गिनती के कुछ लोग ही लगे हुए हैं। क्या इतने से दुनिया बच जाएगा? आप सोच कर देखिए।चलो हम मान लेते हैं कि हम ये ज़िम्मेदारी को लेना नहीं चाहते क्योंकि आज मानव सभ्यता पूरी तरह से लापरवाह, आरामपरस्त और ख़ुदगर्ज़ हो गया है।ठीक है हम ऐसा महान कार्य नहीं कर सकते।कम से कम वृक्ष की अवैध कटायी को तो रोक सकते हैं ना?

प्रकृति को यथास्थिति में छोड़ दें तो वो 5 से 10 साल के अंदर ख़ुद को सँवार लेगी और एक हद तक बेहतर स्थिति में आ जाएगी; लेकिन नहीं, हमको तो पेड़ भी नहीं लगानी है, और हमें नवीनतम इमारती लकड़ी चाहिए वो भी बेहतर लकड़ी, हमें दरवाज़े चाहिए, खिड़की चाहिए, शोफ़ा चाहिए ना जाने क्या- क्या मनुष्य की अभिलाषाएँ अनंत हैं। आज के समय में 90% घरों में लकड़ी के सामान इस्तेमाल हो रहे हैं ।
एक समय एक व्यक्ति ने बोला था मैं पानी बेचना चाहता हूँ तब लोगों ने उसका मज़ाक़ उड़ाया था, लेकिन आज के समय में पानी बिक रहा है और लोग पानी ख़रीद के पी रहे हैं । वैसे ही एक दिन आएगा जब लोग हवा ख़रीद के साँस लेंगे और ज़िंदा रहने के लिए ऑक्सीजन का सिलेंडर पीठ में ढोके चलना पड़ सकता है जिसे मोबाईल की तरह रिचार्ज करना पड़ेगा।अभी सबको ये बात बकवास लगेगा। लेकिन परिस्थियों को देखते हुए वो दिन दूर नहीं है।

एक और बुरी बात देखने को मिलती है,जंगल में लोग इस लिए आग लगा देते हैं कि उन्हें अपने महुआ उठाना है।आग लगाए स्थान पर बरसात के समय पूटू, मशरूम मिल सके।मैं अपने क्षेत्र में देखा तो लगा ये सिर्फ़ मेरे क्षेत्र में ही होता है लेकिन जब मैं दूसरे क्षेत्र पर गया तो मैंने देखा सब जगह यही हाल है। शायद आप सबने भी देखा ही होगा। आग लगने से जो छोटे-छोटे, पेड़ -पौधे जल के ख़त्म हो जाते हैं। जो आने वाले समय में बड़े पेड़ बनते। साथ में कितने सारे जीव -जंतु जल कर मर जाते है। सरकार को इसके ख़िलाफ़ सक्त क़दम उठाने की ज़रूरत है और हम भी ऐसे कुछ करते देखते हैं तो हमें उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहिए ।अगर वक़्त रहते हम ये बात समझ नहीं पाए तो, एक दिन वक़्त हमें समझा देगा और वो वक़्त ऐसे होगा जहाँ से वापस आने के लिए हमारे पास वक़्त बचा ही नहीं होगा।

आओ हम सब मिलकर ऐसा कुछ करें कि धरती,धरती ही बनी रहे, परग्रह ना बन जाए। इस विषय के लिए एक लोक आंदोलन चलाएँ, जिस रीति से हम शुबह-शाम भोजन को स्मरण करते हैं, उसी रीति से धरती को सजाने के लिए सुबह-शाम सश्रम स्मरण करें।